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2 शादियां कीं, पहली पत्नी झोपड़ी में ही रहीं, 3 बेटी, 1 बेटा है, लेकिन लोग जानते सिर्फ चिराग को हैं

New Delhi : आज जो हश्र चिराग पासवान का हुआ है उसके बाद रामविलास पासवान और उनके कृतित्व को भी याद करना लाजिमी हो गया है। आखिरकार रामविलास पासवान उन गिने चुने नेताओं में थे जो यदाकदा ही विवादों में आयें। हालांकि उनकी व्यक्तिगत जीवन ही विवादों से भरी रही पर आम लोगों में उन्होंने अपनी छवि ऐसी बना रखी थी, उनके विवादों की चर्चा कभी हुई भी या नहीं भी।

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1969 में पहली बार विधायक बनने के बाद से राजनीति में 51 साल गुजारने के बाद साल 2020 में दुनिया को अलविदा कहनेवाले रामविलास पासवान की निजी जिंदगी के बारे में लोग कम ही जानते हैं। पासवान ने दो शादियां कीं थी। उनकी पहली पत्नी आज भी बिहार के खगड़िया के उनके पैतृक आवास में रहती हैं। वे जब राजनीति में नहीं आये थे तभी पहली शादी हो गई थी। उस शादी से उनकी दो बेटियां हैं, जबकि दूसरी पत्नी से एक बेटे चिराग पासवान व एक बेटी है।

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पहली शादी से उनकी बेटी आशा पासवान ने पिछले वर्ष उनके देहावसान के बाद आरोप भी लगाया था कि उनकी बीमारी के हालत में भी छोटी मम्मी ने षडयंत्र रचकर हमलोगों की मुलाकात उनसे नहीं होने दी। हमलोगों ने हवाई जहाज का टिकट भी ले लिया था लेकिन अंतिम समय में यह कहकर मना कर दिया कि अभी लॉकडाउन है, अभी यहां आने की कोई जरूरत नहीं है। आशा देवी कैमरे के सामने ही फूट फूट कर रोईं थीं।

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बहरहाल बात रामविलास पासवान की। उनको लेकर सोसाइटी में एक बड़ी युक्ति थी। और यह युक्ति थी कि वे पॉलिटिक्स के मौसम विज्ञानी हैं। वे जिसके साथ जाते हैं, उनकी सरकार बन जाती है। पिछले तीन दशक में शायद ही कोई प्रधानमंत्री हो जिसकी कैबिनेट में वे नहीं दिखे। जहां वे अटल बिहारी वाजपेयी के कैबिनेट में थे तो यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार में भी बेहद महत्वपूर्ण महकमा संभाला। और फिर जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो वे कैबिनेट का चेहरा थे। पॉलिटकल सर्किल में तो कहा ये भी जाता था कि मौसम विज्ञानी भी कभी-कभी गलती कर बैठते हैं लेकिन रामविलास पासवान से ऐसी गलती बिलकुल नहीं हुई। पर लगता है इस पूर्वानुमान का शुरुआती ज्ञान भी वे चिराग पासवान को देना भूल गये या फिर ये एक ऐसा नैसर्गिक ज्ञान था जो वे चाह कर भी अपने बेटे में ट्रांसफर नहीं कर सके जबकि वे चाहते तो यही थे कि चिराग उनकी विरासत को संभालें।

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सबसे बड़ी बात यह रही कि वे किसी भी पार्टी के साथ रहे हों या फिर पार्टी में रहे हों। उनका पब्लिक कनेक्शन बदस्तूर बना रहा। वे किसी के साथ रहकर चुनाव लड़े हों, चुनाव में रिकार्ड मतों से जीतने का उनका रिकार्ड बनना तय ही था। चाहे वो जनता दल में रहे हों या फिर लोजपा में। चाहे वो कांग्रेस गठबंधन में रहे हों या फिर राजग गठबंधन में। वे अधिकांश समय केंद्र में ही मंत्री रहे और सांसद रहे। पर, इस दौरान भी उनका मन बिहार में ही रमा रहता था। वे बिहार से अलग कुछ भी सोच ही नहीं पाते थे। केंद्र में मंत्री बनने के बाद बिहार ने उनके दिल पर राज किया। योजना कोई भी हो, बिहार के ही हिस्से में आती थी।

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हालांकि इन सबके बीच में बिहार का नेतृत्व करने, बिहार का सीएम बनने की इच्छा उनकी कभी पूरी नहीं हो सकी। लालू के शासनकाल में लालू प्रसाद के साथ भी रहे और विरोध में भी लेकिन इस दौरान किसी को मौका ही नहीं मिला। और उसके बाद नीतीश कुमार का राज आ गया जो अब तक बरकरार है। उन्होंने सबसे अलग होकर अपनी पार्टी भी बनाई लेकिन उनकी पार्टी बिहार में कभी इस हैसियत में नहीं रही कि बिहार के राजकाज का नेतृत्व कर सके। उनको हमेशा केंद्र में मंत्रीपद से ही संतोष करना पड़ा।

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रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर 1969 में तब शुरू हुआ था, जब वे सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर बिहार विधानसभा के सदस्य बने थे। खगड़िया में एक दलित परिवार में 5 जुलाई 1946 को जन्मे रामविलास पासवान ने इमरजेंसी का पूरा दौर जेल में गुजारा। 1977 की रिकॉर्ड जीत के बाद रामविलास पासवान फिर से 1980 और 1989 के लोकसभा चुनावों में जीते। इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में उन्हें पहली बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया। इसके बाद विभिन्न सरकारों में पासवान ने रेल से लेकर दूरसंचार और कोयला मंत्रालय तक की जिम्मेदारी संभाली।

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पिछले तीन दशक में त्रिमूर्ति नेताओं का बोलबाला रहा। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान इस त्रिमूर्ति का हिस्सा रहे। तीनों ने एक दूसरे के साथ मिलकर और अलग होकर भी काम किया। लेकिन व्यक्तिगत वैमनस्य कभी इनके बीच नहीं दिखा। जितनी जल्दी इनके बीच राजनैतिक झगड़ा होता उसी तेजी से राजनैतिक विवाद हल भी हो जाता।

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input – daily bihar

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